Tuesday, June 7, 2011

मेरे महबूब मेरे मसीहा

मेरे महबूब मेरे मसीहा

हमने तो तुम से दुआ मांगी थी

मगर तुने बद-दुआ क्यों दे दी

हमने तो जिन्दगी मागी थी तुमसे

तुने मोंत सी फिजा क्यों दे दी

मेरे महबूब मेरे मसीहा

होंठो पे मुस्कान खेली भी ना थी

उन पे गमगीन गीत क्यों दे दिये

मेने तुम से खुशिया मांगी थी

तुमने गम-ही गम मेरे मीत क्यों दे दिये

मेरे महबूब मेरे मसीहा

जिन्दगी इतनी गमगीन तन्हा है

शायद मोंत इससे बेहतर होगी

हां ऐसा ही लिखा था किस्मत मे मेरी

मेरी जिन्दगी बस तेरी एक नजर हो गई

मेरे महबूब मेरे मसीहा

पहले तो तू नफरत किया करती थी

अब तुम मुझे यद् क्योकर नही आती

पहले तेरे , फिर तेरी याद के काबिल ना रहे

अर्पण को अब कोइ चीज नही भाती

मेरे महबूब मेरे मसीहा

अनीता शर्मा को समर्पित सादगी से

राजीव अर्पण


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