Wednesday, May 11, 2011

रतिया

रतिया

तुम बिन रतिया केसे गुजरू

आ जा आ जा तुम्हे पुकारू

सेज भी सूनी दिल भी सूना

आ तेरे लिए मै सेज संवारू

शिंगार से अब दिल भरता नही

आ जा सारा शिंगार उतारू

कोमल बदन तेरा शीतल मन

उस पे प्रेम का रूप नितारू

दिल की ना होती मिटा भी लेती

यह दिल की है इसे केसे मारू

राजीव अर्पण

No comments:

Post a Comment